Tuesday, May 30, 2006

गर्दिश

बहुत दिनों से
हँसा नहीं हूँ
कि तुम नहीं हो
या आशा-अपेक्षा भरी
कितनी ही नजरें
गडी हैं मेरे चेहरे पर
पीते हुए लोच चेहरे का
या मैं सुनने लगा हूँ
बाबा की लाचार आँखें
पढने लगा हूँ
बहन का सयानापन
या थामने चला हूँ दौर गर्दिशों का।