Monday, June 15, 2009

सरहदें

सरहदें हैं

कुछ मुटावों की

शिकवों-गिलों की


तैनात है जहां

अपने-अपने अहम

पैनी निगाहों के साथ

मगर

हवाओं में खुशबू सी

सूरज के उजियारे सी

खलिश रुकी कहाँ


अपनापन थमा कहाँ

अपनी-अपनी सरहदों में

कैद हैं हम


कुछ खलिश लिए

और कुछ अपनापन भी।

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सम्प्रति: समग्र साहित्य की वेब पत्रिका 'हिंद युग्म' की मई माह की यूनिकवि स्पर्धा में शीर्ष दस कविताओं में स्थान प्राप्त. एवं इसके बाद www.aakhar.org में भी प्रकाशित.

7 आपकी राय:

vibhuti pandya ने कहा…

Hi Jitu Bhai,
After long time I could see your creation, Such a nice poem and awesome words, thoughts,imagination........keep it up.

Best Regards,
Vibhuti Pandya

जितेन्द्र दवे ने कहा…

उत्साहवर्धक प्रशंसा के लिए धन्यवाद विभूती.

ARUNA ने कहा…

जितेन्द्र जी, बहुत खूब! बहुत सुन्दर कविता लिखा है आपने!
मेरे ब्लॉग में टिप्पणी छोड़ने का बहुत बहुत शुक्रिया आपका!

vibhuti pandya ने कहा…

Many-Many Congratulations Ek Baar phir Pita banne ke liye. Yaar apne blog me Bete ka ek photo to lagao taki hum bhi use dekh paye.

Congratulations, Sarhde Hind Yugm ke shirsh 10 kavitao me aane ke liye.

Agli Kavita ke intzaar me,
Aapka
Ankoo

मुकेश कुमार तिवारी ने कहा…

जीतेन्द्र जी,

बहुत ही सधई हुई कविता :-

अपनापन,
थमा कहाँ
अपनी-अपनी सरहदों में
कैद हैं हम
कुछ खलिश लिए
और कुछ अपनापन भी।

अच्छी रचना के लिये बधाईयाँ।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

चाँद मोहम्मद ने कहा…

दवे साहब
मेरे ब्लॉग पर आकर टिप्पणी देकर मेरा होसला अफजाई करने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया
जुडाव बनायें रखें

नीरज गोस्वामी ने कहा…

अद्भुत रचना...बहुत ही अच्छी...बधाई स्वीकार करें..माँ सरस्वती की कृपा आप पर सदा यूँ ही बनी रहे...
नीरज